किताबों में चुपके-से दबा रक्खा
समय के दबाव से
कुछ सूखा कुछ सख़्त-सा
हो गया
वो सूखा गुलाब, अब कहाँ मिला करता है।
जिस जगह फूल को पन्नों ने
अपने छूने से दबाया था
वहीं ऐन जगह
कैसे छोड़ देता फूल अपना निशान
अपना रंग
जो अब पन्नों पर उगा होता।
उसके किनारे जो सख़्त होके
कोणों से टूट जाते
वहीं पन्नों के व्यास पर बिखर जाते।
चटख रंगीनी से भरा फूल भी
अपने रंग की कणिकाओं से
अलग हो हल्का हो जाता
और शायद अपने असल
से कई बार गहरा भी।
गुजरते समय ने उसे भी तो
कुछ उदास थोड़ा गंभीर किया था।
वो जो हवाओं के चलने से
सिहरा-सिहरा करता था।
डाल में जड़ा जिसकी खुशबू
बस चंद दिनों की मेहमान होती थी
उसे पन्नों में दबा लेने से
उसकी गंध भी तो ठोस हो जाती थी।
फूल को यूं पन्नों के बीच दबा देना
एक साथ
कितना कुछ बयां
करता था, कुछ अधूरी ख्वाहिशें
कुछ यादों को अपनी गिरफ़्त
में रखने का गुमान।
ठीक उस क्षण जब फूल दबाए
जा रहे थे, उस वक़्त के एहसास
सब कुछ उस फूल के साथ
जज़्ब हो जाते हैं।
ताकि सालों बाद जब कभी
भूले बिसरे फिर से
जो कभी यूं ही भटक
कर वह किताब हाथ में आए
और पन्नों को उलटते- पलटते
वो ठीक क़रीने से दबा
बाहर की दुनियाँ के हलचलों से
सुरक्षित,
दबा मिल जाए वो गुलाब।
और फिर लौट सकें उन स्मृतियों में
जिस फूल ने हमसे अधिक
संभाले रखा है।
अब यूं किताबों मे दबे फूल
नहीं मिलते।
फूल को सहेजने की ज़रूरत नहीं लगती
भागती-सी ज़िंदगी में
खिले ताज़ा दम फूल गुलदानों में
सज जाते हैं और
मुरझाने पर फौरन नज़रों से दूर।
अब किताबें फूलों को और
फूल किताबों को बस
हसरत से ही निहारा करते हैं।
किताबों में भूले भटके
फूल नहीं मिला करते।
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