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जो हिमालय है वही तो समंदर है,

गर कहीं कोई भेद है तो वो हमारे अन्दर है,

हम हैं ही ऐसे अन्दर करते अंतर ,अंतर को जीते निरंतर,

जो मुस्कुराहट है वो एक सी ही तो है,

गरीब की अमीर की , उसमें अंतर की गुंजाइश कभी नही दिखी,

एक जैसे होंठ खुलते एक जैसे आकर में वो हंसते,

मगर हम भेद उनमें करते,सामने तो नज़र से जी भर के देखते,

अंदर उसी पल तकसीमों की तलाश करते,

हैं न !हम ही ऐसे !!अंदर करते अंतर,अंतर को जीते निरंतर,

जो गुलाब है वही तो गुड़हल है,

दोनों रंग बिखेरते, दोनो खुशबू से महकाते,

गुलाब को प्रेम प्रतीक बना दिया हमने, गुड़हल को बस यूंही आंगन में सजा दिया हमने,

हम! हम हैं ही ऐसे अन्दर करते अंतर,अंतर को जीते निरंतर !


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