गुज़रे सालों की किरचें सम्भाले
यूँ ही अचानक एक दिन
मिल जाऊँगी तुमसे नये साल में ।
थोड़ी उम्मीद थोड़ी परेशानी लिए
अपने हालात की कुछ बदगुमानियाँ भरे
युगों से झेली हुई वीरानियाँ
साँसों में गुज़री इंतज़ार की घड़ियाँ
थोड़े बेहतर जी लेने की संभावनायें
सब कुछ अपनी आँखों में सम्भाले
भरे हुए लिफ़ाफ़े की तरह मिल जाऊँगी।
खोलने पर मिल जायेंगी उसमें
थोड़ी सी ख्वाहिश तुम्हें पा लेने की
और साथ ही थोड़ी खीझ
अपनी इस अहमक ज़िद पर।
ज़रा नीचे की तरफ़ किनारे पर लगी
लिफ़ाफ़े के एकदम भीतर
मिल जायेंगी तुम्हें मेरी बेसब्रियाँ भी,
मेरी अंतहीन प्रतीक्षा की इबारतें
जो तुमसे सात समंदर के फ़ासलों
ने मेरे पूरे वजूद पर लिख दिया है।
लिफ़ाफ़ा खोलने पर मिलूँगी मैं
सर्दियों की उतरती मद्धम धूप की तरह
साँझ के झुटपुटे में चूल्हे पर चढ़ी
चाय में बस गये धुएँ की तरह
रात भर टकटकी बांधे
धरती को निहारते चाँद की तरह,तुम्हें
मैं नहीं बल्कि ख़ुद तुम की तरह।
क्या कहूँ कि गुज़िश्ता सालों ने
मुझे भी ठोस से एकदम ही
अमूर्त कर दिया है।
इतना कि छूकर नहीं बस महसूस
कर के ही मुझे पाया जा सकता है।
धूप धुएँ या चाँद की सर्द टकटकी
को जैसे बस महसूस करते हैं
सालों की किरचनें समेटे मैं भी
बस फ़क़त एहसास हो गई हूँ
तुम्हारे ध्यान में मग्न में
तुम्हारा ही प्रतिबिंब हो गई हूँ।
पर एहसासों के दरमियाँ भी
मेरी अधूरी इच्छाएँ, बाँकी हैं
जैसे कुछ साबुत ठोस सपने
जिनमें हर रात मानो मैं फिर से जन्म लेती हूँ।
उन सपनों में कुछ भी अमूर्त नहीं होता
जीते जागते हम दो ,
मानो युगों से एक दूसरे से लिपटे
देह के हर एक पोर हर शिराओं से
संवाद करते आ रहे हों।
बंद लिफ़ाफ़े में
ज़रा ग़ौर से देखने पर तुम्हें
मिल जाएगा मेरी इच्छाओं का स्पर्श भी
उसकी गर्माहट और ठंडक से भरपूर।
स्वयं को एक साथ अनुभूति और देह के दो
शून्य में विस्तृत कर
तुम तक यह लिफ़ाफ़ा समय के हाथों
भिजवा रही हूँ क्योंकि
समय ही साक्षी है दोनों का
इसने एक साथ मुझे कई कई जन्म लेने
की सुविधा दी है और
उन जन्मों में घुली हुई संवेदनाएँ
समेट पाने की ताक़त भी।
समय से निरपेक्ष मैं वह शून्य हूँ जो
हर युग हर क्षण तुम्हें
हमारे होने का एहसास दिलाएगा,
तुम्हारी विराटता को स्वयं में
समाहित कर सकेगा, इसीलिए
यह बंद लिफ़ाफ़ा सालों को समेटता
अब तुम खोलना
केवल नये साल में।
No comments:
Post a Comment