इतनी आज़माइश थी
तो तुमने
पल भर का मुसाफिर
बना
मुझे रुसवा कर दिया
इतनी आज़माइश थी
तो तुमने
गद्दार नहीं
मुझे काफ़िर
का दर्जा दिया
आज़माइश थी:
कई बार
वो
मुझे बीच दरबार
कटे कानों
का ढेर दे गए
आज़माइश थी
की पूरा समाह
मेरे खिलाफ
हो गया
महज़ तुम्हारा
नाम सुन
मैने फ़िर भी
अपनी मासूमियत
और शदीद
नादान होने की
बात कही
वो सब
मुझे
चुन चुन के
घुटे गले
के रास्ते
भेजते गए
***
ना हुज़ूर
ना मिया
ना शरीफ़
ना बदनाम
मुझे बस गली के गहरे नाले
के रास्ते
रवाना कर दिया
और कहा:
"तेरी आज़माइश
ही तेरी
कलम से फूटी है
अब तेरा हर दोस्त
तेरे हुकूक
को धुआं
धुआं
बना
रवाना हो चला है
अब तू
भी अपनी
तीसरी मंज़िल
ढूंढ़"
***
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