मील पत्थर
कई तरफ हैं
पर उनसे रास्ते निकलते नही
सब पर
अलग अलग
चेहरे है
सब पारदर्शी हैं
हर पत्थर
पर कल
की उड़ती उड़ती
खबरों की
ख़ाल चिपकी है
**
सब टूट रहे हैं
बड़े हाथों
पर लगी
सबसे छोटी उंगलियों से
उन्होंने रास्तों को रोक रखा है
अब मील
चल रहे हैं
बिना किसी राह के
पत्थर अब
भट्टो से बनकर
गलते हाथों में
टुकड़े टुकड़े हो
टूट रहे हैं
***
इस मुल्क की गज भर
ज़मीन भी फट रही है
बिना अपने ईमानदार
बाशिंदों के
पत्थर तो फेंकेंगे सब
जब सर पहले से
झुके हैं
जब दूसरे रास्तों पर चलने वाले
भी उनके नाम
के रंगों को
अपने मस्तक का
लाल बनाएंगे
***
अब पथराव होगा
अब ज़मीन फटेगी
ऐसे ही ज़लज़ले से
*****
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